धारी देवी मंदिर , देवी काली माता को समर्पित एक हिंदू मंदिर है । धारी देवी को उत्तराखंड की संरक्षक व पालक देवी के रूप में माना जाता है । धारी देवी का पवित्र मंदिर बद्रीनाथ रोड पर श्रीनगर और रुद्रप्रयाग के बीच अलकनंदा नदी के तट पर स्थित है । धारी देवी की मूर्ति का ऊपरी आधा भाग अलकनंदा नदी में बहकर यहां आया था तब से मूर्ति यही पर है । तब से यहां देवी “धारी” के रूप में मूर्ति पूजा की जाती है । मूर्ति की निचला आधा हिस्सा कालीमठ में स्थित है, जहां माता काली के रूप में आराधना की जाती है | माँ धारी देवी जनकल्याणकारी होने के साथ ही दक्षिणी काली माँ भी कहा जाता है | माना जाता है कि धारी देवी दिन के दौरान अपना रूप बदलती है । स्थानीय लोगों के मुताबिक, कभी एक लड़की, एक औरत, और फिर एक बूढ़ी औरत का रूप बदलती है । पुजारियों के अनुसार मंदिर में माँ काली की प्रतिमा द्वापर युग से ही स्थापित है । कालीमठ एवं कालीस्य मठों में माँ काली की प्रतिमा क्रोध मुद्रा में है , परन्तु धारी देवी मंदिर में माँ काली की प्रतिमा शांत मुद्रा में स्थित है ।
मंदिर में माँ धारी की पूजा-अर्चना धारी गाँव के पंडितों द्वारा किया जाता है। यहाँ के तीन भाई पंडितों द्वारा चार-चार माह पूजा अर्चना की जाती है । मंदिर में स्थित प्रतिमाएँ साक्षात व जाग्रत के साथ ही पौराणिककाल से ही विधमान है । धारी देवी मंदिर में भक्त बड़ी संख्या में पूरे वर्ष मां के दर्शन के लिए आते रहते हैं । धारी देवी मंदिर में मनाए जाने वाले कई त्योहार है , उनमें से दुर्गा पूजा व नवरात्री में विशेष पूजा मंदिर में आयोजित की जाती है , यह त्यौहार धारी देवी मंदिर के महत्वपूर्ण त्योहार हैं । मंदिर में प्रतिवर्ष चैत्र व शारदीय नवरात्री में हजारों श्रद्धालु अपनी मनौतियों के लिए दूर-दूर से पहुँचते हैं। मंदिर में सबसे ज्यादा नवविवाहित जोड़े अपनी मनोकामना हेतु माँ का आशीर्वाद लेने पहुँचते हैं।
धारी देवी मंदिर में धारी देवी का रहस्य :-
मंदिर में स्थित पुजारियों के अनुसार यह कथा है कि एक रात जब भारी बारिश के चलते नदी में जल बहाव तेज था । धारी गाँव के समीप एक स्त्री की बहुत तेज ध्वनि सुनाई दी , जिससे गाँव के लोग डर गए , कि किसी स्त्री के साथ कोई अनहोनी ना हो गयी हो । जब गाँव के लोगों ने उस स्थान के समीप जाकर देखा तो वहाँ गाँव के लोगों को पानी में तैरती हुई एक मूर्ति दिखाई दी । किसी तरह ग्रामीणों ने पानी से वो मूर्ति निकाली और मूर्ति निकालने के बाद कुछ ही पल में देवी आवाज ने उन्हें मूर्ति उसी स्थान पर स्थापित करने के आदेश दिये , तब से धारी गाँव के लोगों ने इस स्थल को धारी देवी का नाम दिया।
2013 की किवंदती उत्तराखंड बाढ़ से सम्बंधित :-
देवी धारी को चार धामों के रक्षक के रूप में सम्मानित किया गया है | जब धारी देवी की मूर्ति को उसके स्थान से हटा दिया गया तो कुछ ही घंटो बाद उस क्षेत्र में बहत बड़ा बादल फटा | भक्तो एवम् श्रद्धालु के अनुसार इस क्षेत्र को देवी के क्रोध का सामना करना पड़ा क्यूंकि देवी को 330 मेगावाट की जल विद्युत परियोजना के लिए रास्ता बनाने के लिए उनके मूल स्थान से स्थानांतरित किया गया था |
एक स्थानीय राजा ने भी 1882 में धारी देवी को मूल स्थान से हटाने की कोशिश की थी , तब भी केदारनाथ में भूस्खलन हुआ था |



