मुनाफे़ की हवस ने एक और मज़दूर की जान ली।-बावल औद्योगिक क्षेत्र
बीते गुरुवार को बावल औद्योगिक क्षेत्र स्थित रिको कारखाने में काम करते हुए 33 वर्षीय रिंटू की मौत हो गई। वे इस कारखाने में हाई प्रेशर डाई कास्टिंग मशीन (एचपीडीसी) पर काम करते थे। इसी मशीन की चपेट में आने की वजह से उनकी मृत्यु हुई।
रिंटू बावल में अपने रिश्तेदार के साथ रहते थे। मिली जानकारी तक कम्पनी इस हादसे पर मुआवजे को लेकर आनाकानी कर रही है।
यह हादसा नहीं है, यह मुनाफे़ की हवस में किया गया कत्ल है। ऑटोमोबाइल उद्योग जो सड़कों पर तेज़ रफ़्तार दौड़ते वाहनों का निर्माण करता है, वह ना जाने रोज़ाना कितने मज़दूरों के ज़िन्दगी की गति रोक देता है। कारखानेदारों का सारा मुनाफ़ा, उनकी सारी अय्याशी का साधन, मज़दूरों के खून को निचोड़ कर आता है। मज़दूर इनके लिए कम्पनी में लगे कल पुर्जे़ से भी बदतर है, जिसके जान की कीमत कुछ भी नहीं।
डाई कास्टिंग मशीन पर अक्सर हादसा होता है, मज़दूर अपनी उंगली, हाथ से लेकर जान तक गंवाते रहते हैं। पूरे औद्योगिक क्षेत्र में रोज़ाना हादसे होते हैं, जिसमें श्रमिक अंग-भंग से लेकर जान तक गंवाते हैं। लेकिन, यह कभी भी मसला नहीं बनता है, अधिकांश मामले बाहर तक नहीं आ पाते हैं। कम्पनी बड़ी चालाकी और “अनुभवी” ढंग से पुलिस, प्रशासन और गुंडों के दम पर ऐसे मसलों को दबा देती है। ना कभी कोई विस्तृत मीडिया रिपोर्ट औद्योगिक हादसों पर देखने जानने को मिलती है, ना ही सरकार या किसी चुनावी पार्टी के एजेंडे पर मज़दूरों की ज़िन्दगी होती है।
अक्सर ये हादसे मशीन कि रख-रखाव की कमी तथा उत्पादन का अव्यवहारिक तेज गति के कारण होते हैं। करखानेदार अधिक मुनाफे़ के चक्कर में श्रमिकों की जान से सौदा करता है, और सुरक्षा के इंतजाम में भारी कटौती करता है। एक तरफ रख-रखाव में लगने वाली लागत की कटौती, और दूसरी तरफ कम से कम समय में अधिक से अधिक उत्पादन का लालच, इस चक्कर में मशीन कि गति बढ़ा दी जाती है और सेंसर नाकाम कर दिया जाता है। ऐसे में मज़दूर को मशीन की गति पर काम करना आसान नहीं रह जाता है। जरा सी हेर-फेर से जान जाने का खतरा रहता है।
पूरे ऑटोमोबाइल सेक्टर में तकरीबन हर कारखाने में पर्याप्त सुरक्षा के इंतजाम के बिना श्रमिकों से काम कराया जाता है। इसमें सबसे ज़्यादा अरक्षित कैज़ुअल कॉन्ट्रैक्ट मज़दूर होते हैं, कम्पनी इनसे मुख्य उत्पादन पट्टी पर स्थाई प्रकृति का काम कराती है और ऐसे हादसों के बाद अपना श्रमिक मानने से ही इनकार कर देती है, साथ ही इन्हें सुरक्षा के सबसे कम साधन मुहैया कराए जाते हैं और काम का दबाव अधिक होता है। कई मौकों पर मज़दूर से ही उल्टा हर्ज़ाना वसूलने का काम किया जाता है, उनकी पगार रोक ली जाती है। औद्योगिक सुरक्षा तथा उत्पादन की गति ऑटो सेक्टर के मज़दूरों की सबसे बड़ी माँगों में से एक है।





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