हाल ही में शाहिद कपूर की एक फ़िल्म आई ‘जर्सी’. कब आई और कब गई पता ही नहीं चला. या सच कहें तो ज़्यादातर दर्शकों को इससे कोई फ़र्क़ भी नहीं पड़ा क्योंकि वो तो इन दिनों अल्लू अर्जुन, यश और रश्मिका मंदाना के जादू से सम्मोहित हैं. जब ओरिजनल इडली-सांबर मिल रहा हो तो पिंडी छोले के साथ डोसा कौन खाये.
कहने का मतलब ये कि साउथ की फ़िल्मों के राइट्स लेकर उनका बॉलीवुड रीमेक बनाने के दिन लगता है अब लद गए हैं. या यूं कहें कि फ़िलहाल तो ऐसा ही नज़र आता है.
तो सवाल वाजिब उठ रहा है कि अब जब साउथ के सितारों की ख़ुमारी देशभर में सिर चढ़कर बोल रही है तो ऐसे में तमिल-तेलुगू-मलयालम-कन्नड़ की ओरिजनल सुपरहिट फ़िल्मों को हिंदी स्टाइल में देखने से क्या अनोखा मिल जायेगा.
साउथ के स्टार देश में किसी के लिये अनजान नहीं हैं. उनकी फ़ैन फ़ॉलोइंग हिंदी बेल्ट में भी बढ़ती जा रही है. स्टाइल कॉपी होने लगी है. गानों और डायलॉग्स पर मीम्स और रील्स बनने लगे हैं. तो ऐसे में सिर्फ़ बॉलीवुड सितारों के साथ इन कॉपी-पेस्ट कहानियों को देखने का क्या मज़ा है.
रीमेक बन रहा घाटे का सौदा
उदाहरण सामने ही है शाहिद कपूर की ‘जर्सी’ जो तीन साल पहले आई तेलुगू की नानी स्टारर जर्सी का हिंदी रीमेक है. ओपनिंग में तीन करोड़ रुपये की भी बोहनी नहीं हुई और पूरी कमाई 20 करोड़ से कम में सिमट गई.
वो कहते हैं, ”अब साउथ की सुपरहिट फ़िल्मों का रीमेक कौन देखना चाहता है. दोबारा बनाकर क्या फ़ायदा होगा. अब जब वो फ़िल्में साउथ से ही हिंदी में डब होकर आ रही हैं तो हिंदी में बनाने की ज़रूरत क्या है? ये लोग अपना बॉक्स ऑफ़िस और अपनी बैलेंस शीट देखते हैं. इनको दर्शकों से क्या मतलब. अब कौन समझाए और किसको. 15 करोड़ वाले कॉन्टेंट और कॉमन मैन की कहानी ने करोड़ों कमाकर दिए हैं, लेकिन मल्टीप्लेक्स वाली 150 करोड़ की थिअरी पलट गई है. उनके दर्शकों को नया चाहिए और बॉलीवुड वाले तो ‘बाहुबली’ और ‘आरआरआर’ की स्केल तो दे ही नहीं सकते.”
यूसुफ़ को लगता है कि ‘बॉलीवुड में तो प्रपोज़ल ही बन रहे हैं. अपनी ख़ुद की फ़िल्में कहां बन रही हैं. ऑडियंस को टेकेन-फ़ॉर ग्रांटेड लिया जा रहा है, लेकिन अब दर्शकों को ये कुबूल नहीं है. सारा खेल टारगेट ऑडियंस को समझने का है और बॉलीवुड में इस पर कोई दिमाग़ ही नहीं लगा रहा है जबकि साउथ वाले सोच-समझ कर ऐसी फ़िल्में बनाते जा रहे हैं. इतना बड़ा ऑडियंस है लेकिन टारगेट ही सेट नहीं है.’
साउथ की सुपरहिट फ़िल्मों का हिंदी रीमेक इससे पहले कोई बुरा सौदा नहीं था. बॉलीवुड के निर्माताओं ने इस फ़ॉर्मूले से भर-भर कर कमाई की है. कारण साफ़ था कि सोशल मीडिया के तूफ़ान से पहले हिंदी बेल्ट के दर्शकों को रजनीकांत और कमल हासन को छोड़कर बहुत ज़्यादा कुछ पता नहीं था. साउथ की फ़िल्में और वहां के बाकी के स्टार बहुत लोकप्रिय नहीं थे इसलिए जब फ़िल्म का मीडिया प्रचार होता था तो पता चलता था कि ये फलां साउथ की फ़िल्म का रीमेक है.



