Tuesday, July 14, 2026
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16 साल का ‘राजकुमार’ दिन के 16 घंटे काम करता है

16 साल का राजकुमार, दुनिया के राजकुमारों जैसा नहीं. इसके ठाठ संसार के राजकुमारों से जुदा हैं. उसे अल-सुबह 4 बजे बिस्तर छोड़ना होता है और फिर रात के 11 बजे कहीं जाकर उस सुकून का दीदार फिर से मयस्‍सर होता है
राजकुमार 7वीं पास कर के बिहार के सहरसा जिले से दिल्ली आया. इसके पहले अपने गांव में उसने शहर दिल्‍ली को सिर्फ टीवी में ही देखा था. घूमने का अरमान लिए गांव के भय्या के साथ महानगर आया. चूंकि ये राजकुमार दुनिया से जुदा है, इसे अपने घूमने के खर्च का इंतजाम खुद ही करना था, जिसके लिए वह गांव के भय्या के जूस के ठेले पर मदद कराने लगा. चार पैसे मिल जाते. लेकिन उनसे दो वक्‍त की रोटी का ही इंतजाम हो जाए तो बहुत है. घूमने भर के पैसे नहीं थे.राजकुमार आया तो शहर घूमने के लिए, लेकिन 6 महीने बीत गए और कहीं भी नहीं घूमा. वक्‍त ही नहीं था. गांव में कितनी भी बदहाली हो, दो वक्‍त ही रोटी तो मिल जाती थी. लेकिन इतने चमकीले शहर में, जहां की सड़कों पर लंबी-लंबी गाड़ियां दौड़ती हैं, जहां की इमारतें इतनी ऊंची कि सिर उठाकर देखने में गर्दन टेढ़ी हो जाए, वहां सिर्फ दो वक्‍त की रोटी का इंतजाम इतना मुश्‍किल होगा, राजकुमार ने कब सोचा था.
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घूमने की आस जाती रही और शहर में जिंदा रहना ही उसका मकसद हो गया. छह महीने बीत गए और इतने समय में वो जूस का ठेला संभालने में माहिर हो गया. सुबह के 6 से रात के 9 बजे तक ठेले पर खड़े रहने वाला राजकुमार अब भय्या की तरह फल छीलने, काटने से लेकर जूस बनाने तक सारे काम फुर्ती से करता है. जूस पैक करते हुए उसकी उंगलियां सहजता से ऐसे घूमती हैं, जैसे बच्चा खिलौने में चाबी भरता है.नोएडा के फिल्म सिटी में जूस के ठेले पर मजदूरी कर रहे राजकुमार को 16 घंटे काम की एवज़ में रोज़ाना 150 रुपए पगार मिलती है, जिसमें से वो किसी दिन 50 से 100 रु. के बीच खर्च करता है और महीने के आखिर तक 3 से 4 हजार रुपए जोड़ लेता है.

इस हाड़तोड़ मेहनत वाली जिंदगी के बीच अगर सुकून का कोई दिन है तो रविवार. जिस दिन दफ्तर बंद होते हैं, फिल्‍म सिटी खाली तो जूस का ठेला भी उस दिन छुट्टी मना लेता है. ठेले की छुट्टी होती है तो राजकुमार को भी छुट्टी मिल जाती है. छुट्टी वाले दिन की दिनचर्या बताते हुए उसके गालों पर नन्हे-नन्हे कटोरे बन जाते हैं. आंखें चमकने लगती हैं. कहता है, ‘सोया रहता हूं, घूमता-फिरता हूं.’

पसंदीदा खाना पूछने पर खामोश हो जाता है. बस इतना ही कहता है, रोटी-सब्जी और चाय-बिस्किट खा लेता हूं. उसने इन 6 महीनों में एकाध बार अपने लिए नोएडा, सेक्टर 4 की सब्जी मार्किट के करीब से ही कुछ सस्‍ते कपड़ें खरीदे होंगे.

नोएडा के सेक्टर 4 में रह रहा राजकुमार छह महीने पहले दिल्ली आया था और फिर घर नहीं जा पाया. अब यही उसका घर है. वही घर, जो ठेले वाले भय्या का है. सुबह 4 बजे भय्या (ठेले का मालिक) मंडी के लिए निकलता है और तभी घर में खाना पकाने वाला आता है. उसी वक्त से राजकुमार का दिन शुरू होता है. वो जूस की दुकान का सामान समेटना शुरू करता है, तब तक घर में खाना पक चुका होता है. 6 से पहले भय्या मंडी से फल लेकर लौटता है और फिर दोनों खाना खाकर सेक्टर 16 में ठेला लगाने के लिए निकलते हैं. दोपहर का खाना ठेले के सामने आने वाली ‘खाने की गाड़ी’, जिसे वो होटल कहता, से 50 रुपए में खरीदते हैं. थाली के पैसे मालिक देता है. राजकुमार का सगा भाई दिल्ली के गांधीनगर मार्किट में माल ढोने वाला ठेला खींचता है.

राजकुमार को गांव की बहुत याद आती है. उसे उम्‍मीद है, दिवाली पर वो जरूर घर जाएगा. दिल्ली में वो सिर्फ एक बार घूमने निकला था और वो घूमना भी कैसा. मेट्रो में बैठकर नोएडा से शास्त्री पार्क गया, जहां उसका सगा भाई रहता है. बाकी उसे कुछ पता नहीं. बस लालकिले का नाम सुना है. हालांकि मेट्रो देखकर उसकी आंखें चौड़ी हो गई थीं. इतनी सुंदर ट्रेन उसने पहले कभी नहीं देखी.

बिहार से जो ट्रेन उसे दिल्‍ली लेकर आई थी, वो तो बहुत बदसूरत सी थी. पान की पीकों और गंदगी से भरी. मेट्रो तो चमकती रहती है. उसे इस बात का भी आश्‍चर्य है कि यहां शहर के अंदर ट्रेन चलती है. उसे लगता था कि ट्रेन तो एक शहर से दूर दूसरे शहर जाने के लिए होती है. मेट्रो जरूर चमक रही है, लेकिन राजकुमार की जिंदगी नहीं और न उसका जूस वाला ठेला. पुराने, जंग खाए ठेले की नियति उस ट्रेन की तरह ही है, जो उसे बिहार से दिल्‍ली लेकर आई.

उसके पिता बिहार में खेती करते हैं. मां घर का चूल्‍हा-चौका करती है. भय्या-भाभी का एक बेटा है. उसे दिन में मां पालती हैं. भाभी, अपने ससुर के साथ खेत में काम करने जाती हैं. भाई हर महीने 8-9 हजार रुपए घर भेजता है, वो भी अपने 3-4 हजार उसे ही दे देता है. वो सारे पैसे वो बैंक में जमा करता, जिन्हें मां बिहार के एटीएम से निकालती है.

राजकुमार को लगता है, ये बस कुछ ही दिनों की बात है. एक दिन वो घर लौटेगा और फिर से पढ़ाई करेगा, आठवीं में दाखिला लेगा. पढ़ाई करके दफ्तर में नौकरी करेगा. नहीं तो बिहार में ही बच्चों के कपड़ों की दुकान खोलेगा. उसे लगता है, कपड़े की दुकान में कमाई अच्छी होती है.

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