
इलाहाबाद विश्वविद्यालय का ऐतिहासिक सीनेट हॉल। अवसर: गणतंत्र दिवस। मंच पर हैं: इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो रतन लाल हांगलूं, उत्तर प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री नरेंद्र सिंह गौर, न्यायमूर्ति पंकज भाटिया। इनके बीच में खड़े जिस व्यक्ति का सम्मान कुलपति महोदय द्वारा किया जा रहा है वह हैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पिछले 40 सालों से मोची का काम करने वाले ‘परेशान रविदास’। आज विश्वविद्यालय के कुलपति द्वारा ‘परेशान जी’ का सार्वजनिक सम्मान किया गया।
हमारी समाज व्यवस्था में नामकरण एक महत्वपूर्ण पक्ष है। न जाने किसने इनके नाम के साथ ‘परेशान’ शब्द जोड़ दिया। परेशान रविदास पिछले 40 सालों से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रावासों में घूम घूम कर जूते की मरम्मत करते हैं। डायमंड जुबली, केपीयूसी हॉस्टल, ताराचंद हॉस्टल, हॉलैंड हॉल हॉस्टल, ए इन झा हॉस्टल,आप किसी भी हॉस्टल का नाम ले लीजिए वहां आपको परेशान काम करते दिख जायेंगे। कंधे पर टँगा एक छोटा सा झोला ही इनका कारखाना है। यह झोला ही इनकी दुकान है। सुबह से शाम तक ये छात्रों के जूते बनाते हैं, या फिर फट गए चप्पल और जूतों की सिलाई करते हैं। परेशान रविदास बताते हैं कि वे 16 साल की उम्र में इलाहाबाद आ गए थे और तब से विश्वविद्यालय के हॉस्टलों में छात्रों का काम करते हैं। उन्हें मोची का काम करते हुए तकरीबन 40 साल हो चुके हैं। वे पिछले चार दशकों से विश्वविद्यालय के जर्रे जर्रे से जुड़े हैं।
दरअसल हमारी आंखें ढ़रें पर चलने वाली चीजों को देखने की अभ्यस्त हो चुकी हैं। हम विश्वविद्यालयों का मतलब सिर्फ प्रोफ़ेसर और विभागाध्यक्ष से लगाते हैं । वैसे लोग जो अप्रत्यक्ष रुप से विश्वविद्यालयों में काम करते हैं हम उनकी ‘नोटिस’ ही नहीं लेते।वे चुपचाप अपना काम करते हैं,उपेक्षित रहते हैं, गुमनामी का जीवन जीते हैं और एक दिन दुनिया से गुजर जाते हैं। हिंदुस्तान का हर बच्चा NCERT के पहले पन्ने पर गांधीजी का जंतर पढ़ता हैं कि सबसे गरीब आदमी की मदद करो। पर क्या हम कभी अंतिम आदमी को ‘मंच और सम्मान’ तक पहुंचने देते हैं?? ‘गण’ आज भी ‘तंत्र’ से दूर है। ‘तंत्र’ पर बड़े बड़े और रसूखदार लोगों का ‘कब्जा’ है। मंच, कुर्सियां,दावत, सम्मान, शॉल सब उनके खाते में चले जाते हैं, आम आदमी के खाते में आती है तो सिर्फ परेशानी,बेबसी,मायूसी।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति महोदय का हृदय से आभार कि उन्होंने समाज के अंतिम आदमी को विश्वविद्यालय के सबसे बड़े मंच पर सम्मानित किया। तकरीबन 2000 छात्रों की मौजूदगी में जब परेशान रविदास को कुलपति महोदय ने सम्मानपूर्वक शॉल ओढाया तो सच्चे मायनों में गणतंत्र साकार हो उठा । बड़े संस्थानों में ऐसे ही दूरदर्शी और संवेदनशील लोगों की जरूरत है। गरीबी और गरीब की बातब तो सब करते हैं पर सच में उन्हें कितने लोग सम्मान देते हैं। इस ऐतिहासिक और सराहनीय पहल के लिए कुलपति महोदय का ह्रदय से आभार।



